Wednesday, April 17, 2024
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चुनावी वेला में कोरोना का खेला

सहीराम

नए साल पर बधाइयां और शुभकामनाएं देने का रिवाज है, सो आपको भी बधाई और बहुत-बहुत शुभकामनाएं। हालांकि कुछ लोग इसी बात पर नाराज हो सकते हैं कि यह नया साल तो विदेशी परंपरा का है। बहरहाल, इस बात पर तो खुश नहीं हुआ जा सकता कि नए साल के साथ कोरोना का नया वेरियंट फ्री मिला है। हालांकि, हमारे यहां ऐसा कहने वालों की कोई कमी नहीं कि लोग तो मुफ्त का बुखार भी नहीं छोड़ते। हो सकता है यह शॉपिंग के शौकीनों और छूट के आदियों के लिए सच भी हो। लेकिन यह कोरोना चुनाव के समय ही क्यों आता है जी? पिछले वर्ष जब बंगाल वगैरह का चुनाव था, तब आया और अब जब पंजाब और यूपी के चुनाव सामने हैं तो यह फिर आ गया। जाहिर है यह चुनावों के वक्त मिलने वाली मुफ्त शराब या मुर्गे के लिए तो आया नहीं होगा। यह मुफ्त की साड़ी और बिंदी के लिए भी नहीं आया होगा। यह अखबारों में रोज छप रहे इस या उस राज्य के विकास की जानकारी लेने भी नहीं आया होगा, क्योंकि आखिर तो लोगों को भी अपने यहां के विकास की जानकारी इन्हीं विज्ञापनों से मिलती है। वरना हकीकत में विकास कहां देखने को मिलता है।

तब फिर इसे क्या लगता है कि चुनाव के वक्त बड़ी-बड़ी रैलियां होंगी तो ज्यादा शिकार मिलेंगे। लेकिन इसे यह समझ लेना चाहिए कि भैया तुम्हारे नए-नए रूप बदलने से तो चुनाव रुकने वाले हैं नहीं। न ही नेता रैलियां करना छोड़ेंगे। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा- गंगा में लाशें तैरेंगी या फिर उसकी रेती में दबी हुई मिलेंगी। श्मशानों में लाइन लगेगी। सॉरी कब्रिस्तानों का नाम लेना भी जरूरी है, वरना यही विवाद हो जाएगा। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा कि लोग ऑक्सीजन के लिए तड़पेंगे। तो भैया लोगों को तो तड़पना ही है। वे रोजगार के लिए तड़पते हैं। वे रोटी के लिए तड़पते हैं। तो इलाज के लिए भी तड़प लेंगे। वे तड़पेंगे, सिर्फ इसलिए तो नेता वोट बटोरना बंद नहीं कर देंगे न। हां, थोड़ी-बहुत तोहमत सहनी पड़ेगी तो चलता है यार। थोड़े दिन में लोग भूल जाते हैं। न पिछला चुनाव याद रहता है, न उसके वादे याद रहते हैं। इसलिए पक्का यकीन है जी कि यह कोरोना चुनाव के वक्त इसीलिए रूप बदल कर आता है कि नेता लोग अपनी आदतों से तो बाज आएंगे नहीं, बड़ी-बड़ी रैलियां जरूर करेंगे और इसलिए उसे खूब शिकार मिलेंगे। ऐसे में नया साल नेताओं को भी शुभ रहेगा कि उन्हें वोट मिलेंगे, गद्दी मिलेगी और कोरोना के नए वेरियंट को मिलेंगे नए-नए शिकार।

रही जनता तो उसे एक बार फिर से विकास के नए वादे मिलेंगे। तो उनका हाल कुछ-कुछ उन सिद्धांतों या उसूलों जैसा ही है, जिनके बारे में फिल्मों में कुछ ऐसे डायलॉग होते हैं-तुम्हारे उसूलों को गूंद कर दो वक्त की रोटी भी नहीं बनायी जा सकती।

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